विनाश काले विपरीत बुद्धि
वैसे तो पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास कभी भी शांत और स्थिर नहीं रहा है|
चाहे सीपीआई सीपीआई(एम) या फिर तृणमूल कांग्रेस का शासन काल रहा हो..हमेशा से ही यहाँ का चुनावी इतिहास हिंसक रक्तरंजित और निंदनीय रहा है!
पर इस बार बंगाल के जैसे हालात हैं इतने निम्न स्तरीय हालात पहले कभी भी नहीं हुए कई वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि पश्चिमी बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं जब भी सत्तारूढ़ पार्टी खुद को कमजोर पाती है और कोई नई पार्टी चुनौती देती सी लगती है तो हिंसा होती ही है
तो क्या यह सच मान लिया जाए की ममता बनर्जी को अपनी हार, अपने हाथ से सरकती हुई सत्ता साक्षात् दिखाई दे रही है...? आखिरकार ममता की इस बहदवासी का कारण क्या है???
बहदवासी का आलम तो यह है की जय श्री राम बोलने वाले को हिरासत में ले लिया जाता है|
कार्टून बनाने वाली महिला को जेल में डाल दिया जाता है सुप्रीम कोर्ट की रिहाई के आदेश की अवमानना की जाती है !
आखिर इस तरह की तानाशाही और हड़बड़ाहट में लिए गए ऊल-जलूल निर्णयों के पीछे कारण क्या है?
एक राज्य की सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठी हुई महिला संविधान की अवहेलना कैसे कर रही हैं.. और क्यों कर रही है?
कैसे वो कह रही हैं कि मैं भारत के प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री नहीं मानती..?
कैसे वो अमर्यादित, निम्न स्तरीय भाषा का प्रयोग अपनी बौखलाहट में करती जा रही हैं..?
जिन आदर्शों को लेकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की सीपीआईएम को हटाया उन्हीं के चरणचिन्हों पर आखिर आज वो कैसे चल रही है..?
दरअसल इसका कारण है उनका सत्ता का दंभ और किसी भी तरह सत्ता हथिया लेने का लालच!
जिसके कारण इस वक्त वो हर झूठ-सच, हिंसा या किसी भी तरह के निम्न स्तरीय, अमर्यादित और असंवैधानिक कार्य करने पर उतर आई हैं!
दरअसल साल 2009 से ही पश्चिम बंगाल में बीजेपी का मत प्रतिशत बढ़ना और पंचायत चुनाव में टीएमसी की तमाम गैर कानूनी दखल के बावजूद बीजेपी को मिली सफलता से ममता बनर्जी पागल हो गई हैं और सत्ताच्युत होने की हताशा में अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रही हैं !
प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी की रैलियों में बढ़ती भीड़ ने ममता बनर्जी की रातों की नींद उड़ा दी है और उन्हें अपने हाथों से सरकती हुई सत्ता साफ दिखाई दे रही है इसीलिए आजकल वह पूरी तरह से विवेकहीन हो गई हैं!
कल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा ने बंगाल की राजनीति को बेहद गर्म कर दिया है जानकारों की माने तो यदि बंगाल पुलिस चाहती तो रोड शो के दौरान हुई हिंसा को रोका जा सकता था..पर उनका मानना है कि यह टीएमसी का पूर्व नियोजित कार्यक्रम था... जिसके तहत हिंसा फैलाना विद्यासागर जी की मूर्ति तुड़वाना और उसके बाद जनता में भावनात्मक आक्रोश उत्पन्न करना उनकी मंशा थी!
फिलहाल चुनाव आयोग ने छह चरण में हुई भयानक हिंसा और अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद पहली बार आर्टिकल 324 के तहत विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए देर से ही सही पर बेहद कठोर व उचित निर्णय लिया है!
जिसका आरोप भी ममता बनर्जी सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर लगा रही हैं.. उन्होंने तो चुनाव आयोग पर भी आरोप लगाते हुए कहा के चुनाव आयोग में सारे संघ के लोग भरे हुए हैं ये सारी बातें ममता बनर्जी के मानसिक दिवालियापन को दर्शाती हैं और कुछ नहीं!
खैर चुनाव आयोग के निर्णय से जहाँ एक ओर 19 घंटे पूर्व ही चुनाव प्रचार थमने से कम से कम हिंसा को कुछ हद तक रोका जा सकेगा वहीं बंगाल के गृह सचिव और एडीजी (सी.आई.डी)को तत्काल प्रभाव से हटाने से चुनाव में निष्पक्षता तो आएगी ही!
बस ममता बनर्जी के लिए सिर्फ इतना ही कहूँगी 'विनाश काले विपरीत बुद्धि!'
वैसे तो पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास कभी भी शांत और स्थिर नहीं रहा है|
चाहे सीपीआई सीपीआई(एम) या फिर तृणमूल कांग्रेस का शासन काल रहा हो..हमेशा से ही यहाँ का चुनावी इतिहास हिंसक रक्तरंजित और निंदनीय रहा है!
पर इस बार बंगाल के जैसे हालात हैं इतने निम्न स्तरीय हालात पहले कभी भी नहीं हुए कई वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि पश्चिमी बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं जब भी सत्तारूढ़ पार्टी खुद को कमजोर पाती है और कोई नई पार्टी चुनौती देती सी लगती है तो हिंसा होती ही है
तो क्या यह सच मान लिया जाए की ममता बनर्जी को अपनी हार, अपने हाथ से सरकती हुई सत्ता साक्षात् दिखाई दे रही है...? आखिरकार ममता की इस बहदवासी का कारण क्या है???
बहदवासी का आलम तो यह है की जय श्री राम बोलने वाले को हिरासत में ले लिया जाता है|
कार्टून बनाने वाली महिला को जेल में डाल दिया जाता है सुप्रीम कोर्ट की रिहाई के आदेश की अवमानना की जाती है !
आखिर इस तरह की तानाशाही और हड़बड़ाहट में लिए गए ऊल-जलूल निर्णयों के पीछे कारण क्या है?
एक राज्य की सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठी हुई महिला संविधान की अवहेलना कैसे कर रही हैं.. और क्यों कर रही है?
कैसे वो कह रही हैं कि मैं भारत के प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री नहीं मानती..?
कैसे वो अमर्यादित, निम्न स्तरीय भाषा का प्रयोग अपनी बौखलाहट में करती जा रही हैं..?
जिन आदर्शों को लेकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की सीपीआईएम को हटाया उन्हीं के चरणचिन्हों पर आखिर आज वो कैसे चल रही है..?
दरअसल इसका कारण है उनका सत्ता का दंभ और किसी भी तरह सत्ता हथिया लेने का लालच!
जिसके कारण इस वक्त वो हर झूठ-सच, हिंसा या किसी भी तरह के निम्न स्तरीय, अमर्यादित और असंवैधानिक कार्य करने पर उतर आई हैं!
दरअसल साल 2009 से ही पश्चिम बंगाल में बीजेपी का मत प्रतिशत बढ़ना और पंचायत चुनाव में टीएमसी की तमाम गैर कानूनी दखल के बावजूद बीजेपी को मिली सफलता से ममता बनर्जी पागल हो गई हैं और सत्ताच्युत होने की हताशा में अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रही हैं !
प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी की रैलियों में बढ़ती भीड़ ने ममता बनर्जी की रातों की नींद उड़ा दी है और उन्हें अपने हाथों से सरकती हुई सत्ता साफ दिखाई दे रही है इसीलिए आजकल वह पूरी तरह से विवेकहीन हो गई हैं!
कल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा ने बंगाल की राजनीति को बेहद गर्म कर दिया है जानकारों की माने तो यदि बंगाल पुलिस चाहती तो रोड शो के दौरान हुई हिंसा को रोका जा सकता था..पर उनका मानना है कि यह टीएमसी का पूर्व नियोजित कार्यक्रम था... जिसके तहत हिंसा फैलाना विद्यासागर जी की मूर्ति तुड़वाना और उसके बाद जनता में भावनात्मक आक्रोश उत्पन्न करना उनकी मंशा थी!
फिलहाल चुनाव आयोग ने छह चरण में हुई भयानक हिंसा और अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद पहली बार आर्टिकल 324 के तहत विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए देर से ही सही पर बेहद कठोर व उचित निर्णय लिया है!
जिसका आरोप भी ममता बनर्जी सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर लगा रही हैं.. उन्होंने तो चुनाव आयोग पर भी आरोप लगाते हुए कहा के चुनाव आयोग में सारे संघ के लोग भरे हुए हैं ये सारी बातें ममता बनर्जी के मानसिक दिवालियापन को दर्शाती हैं और कुछ नहीं!
खैर चुनाव आयोग के निर्णय से जहाँ एक ओर 19 घंटे पूर्व ही चुनाव प्रचार थमने से कम से कम हिंसा को कुछ हद तक रोका जा सकेगा वहीं बंगाल के गृह सचिव और एडीजी (सी.आई.डी)को तत्काल प्रभाव से हटाने से चुनाव में निष्पक्षता तो आएगी ही!
बस ममता बनर्जी के लिए सिर्फ इतना ही कहूँगी 'विनाश काले विपरीत बुद्धि!'
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